मैं हरी भरी थी जंगल में
मैं हरी भरी थी जंगल में,
मैं खूब खड़ी थी जंगल में,
सर्दी गर्मी बरसा ऋतुएँ,
मैं खूब लड़ी थी जंगल में।
बेदर्द पहाड़ों से कटवाकर,
मुझे गलियों में फिकवा डाला,
जितना हिस्सा मेरा ठीक रहा,
और बाकी का फिकवा डाला।
फिर लोहे की सलाखें गर्म करके,
मेरा अंग-अंग छिदवा डाला,
हे राधे इतने कष्ट सहे मैंने,
तब मिला मुझे मुरली वाला।
भजन लेखक और गायक
विष्णु भैया जी श्याम सखा