सुनो सुनाऊँ प्रेम की गाथा,
धर्म, त्याग और मान की।
युगों-युगों तक अमर रहेगी,
कथा प्रभु श्रीराम की।
जय श्रीराम...
जय श्रीराम...
सीता राम...
जय श्रीराम...
सरयू तट पर बसी अयोध्या,
सुख से भरा था धाम।
दशरथ राजा न्याय के सागर,
सबकी जुबां पर नाम।
तीनों रानियाँ प्रेम की मूरत,
राजमहल मुस्काया।
पुत्र कामना पूर्ण हुई जब,
हर आँगन दीप जलाया।
राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न,
चारों रत्न कहाए।
देवों ने भी फूल बरसाए,
मंगल गीत सुनाए
जय श्रीराम...
जय श्रीराम...
धरती के अभिराम।
प्रेम, दया और सत्य का,
गूँजे पावन नाम।
बचपन बीता सीखते-सीखते,
गुरुकुल का सम्मान।
धनुष-बाण में पारंगत होकर,
बढ़ा सभी का मान।
विश्वामित्र ऋषि जब आए,
राक्षस करने नाश।
राम-लखन संग वन को निकले,
पूरा करने विश्वास।
ताड़का का अंत किया फिर,
ऋषियों का उद्धार।
धर्म बचाने आगे बढ़े वो,
यही था उनका प्यार।
सुनो सुनाऊँ प्रेम की गाथा,
धर्म, त्याग और मान की।
युगों-युगों तक अमर रहेगी,
कथा प्रभु श्रीराम की।
जय श्रीराम...
जय श्रीराम...
सीता राम...
जय श्रीराम...