आज मैं सुनाता हूँ, नीलकंठ महादेव की कथा,
कैसे जग को बचाया, भोलेनाथ की कथा।
हर-हर महादेव गूंजे, कैलाश धाम की कथा,
आज मैं सुनाता हूँ, नीलकंठ महादेव की कथा।
एक समय देवों पर संकट आया,
असुरों ने स्वर्ग पर अधिकार जमाया।
कमज़ोर हुए जब सारे देवता,
विष्णु जी ने दी उन्हें एक राह।
क्षीरसागर का मंथन करना,
अमृत पाने का सपना था।
देव-असुर मिल साथ खड़े थे,
मंदराचल पर्वत मथानी था।
वासुकि नाग रस्सी बना था,
मंथन का फिर आरंभ हुआ।
कूर्म रूप धर विष्णु आए,
पर्वत को अपनी पीठ उठाए।
घूमा पर्वत, मंथन हुआ,
सागर में फिर कंपन हुआ।
सबसे पहले विष निकला,
हलाहल नाम भयंकर था।
धरती जली, आकाश डरा,
हर जीव का मन भय से भरा।
देव-असुर सब घबरा गए,
भोलेनाथ की शरण में आए।
आज मैं सुनाता हूँ, नीलकंठ महादेव की कथा,
कैसे जग को बचाया, भोलेनाथ की कथा।
हर-हर महादेव गूंजे, कैलाश धाम की कथा,
आज मैं सुनाता हूँ, नीलकंठ महादेव की कथा।