अँधेरी सी गुफ़ाओं से
तर्ज़-मुझे तेरी मोहब्बत का सहारा मिल गया होता
अँधेरी सी, गुफ़ाओं से, अचानक, ज्योत लहराई ॥
न हम समझे, न तुम समझे, भवानी चल, के ख़ुद आई ॥
बिछी है, चन्दन की चौकी, बिछे हैं, गद्दे मख़मल के ॥
न हम समझे, न तुम समझे, आसन, मईया ने, लगाया है ।
अँधेरी सी, गुफ़ाओं से, अचनक, ज्योत लहराई...
रखी है, चन्दन और रोली, रखी है, कुमकुम और मेंहदी ॥
न हम समझे, न तुम समझे, तिलक, मईया ने, लगाया है ॥
अँधेरी सी, गुफ़ाओं से, अचनक, ज्योत लहराई...
रखे हैं, लंहगा और चुनरी, रखे हैं, गहनों के डिब्बे ॥
न हम समझे, न तुम समझे, श्रिंगार मईया, करने आई है ॥
अँधेरी सी, गुफ़ाओं से, अचनक, ज्योत लहराई...
रखे हैं, दीपक और बाती, रखे हैं, लौंग के जोड़े ॥
न हम समझे, न तुम समझे, ज्योत, मईया ने, जलाई है ॥
अँधेरी सी, गुफाओं से, अचनक, ज्योत लहराई...
रखे हैं, हलवा और पूरी, रखे हैं, लड्डू और पड़े ॥
न हम समझे, न तुम समझे, भोग, मईया ने, लगाया है ॥
अँधेरी सी, गुफाओं से, अचनक, ज्योत लहराई...
आई जब, चलने की बारी, विदा मईया ने, माँगी है ॥
न हम समझे, न तुम समझे, जयकारा, भक्तों ने, लगाया है ॥
अँधेरी सी, गुफाओं से, अचनक, ज्योत लहराई...
अपलोडर- अनिलरामूर्तिभोपाल