तरसे नज़रिया वो

स्थाई:- तरसे नज़रिया वो... तरसे नज़रिया वो... 2
दे दर्सन के दान वो मईया,तरसे नज़रिया वो..
चढ़- तोर मुहरन के वो...झलक देखादे वो...॥
तरसत मोर परान वो मईया...तरसे नज़रिया वो

तोरे धियान म बुड़े रहीथव, आठो पहर बर माता वो ।
मोर अरजी ल सुनबे कभू वो राखे हव बिस्वासा वो ।
चढ़- दया मया के वो... अमृत झलकादे... ॥
झन कर बेड़ बिहान वो मईया...तरसे नज़रिया वो

देखे बर हिर्दय कलपत हे, नयना दरस के पियसा वो
ये जिनगी ल पार लगादे, अटके हव मोह फासा वो
चढ़- इंदरी जुड़ाही वो... अंतस सुःख पाहि वो ॥
देदे अजब बरदान वो मईया... तरसे नज़रिया वो

सगरो जगत के तै महारानी, सरबस तोरे बासा वो ।
भाग ल मोर जगादे मईया,करदे कुछु आभासा वो ।
चढ़- सतजुगहीन मईया वो...मोर मंसा पुरादे वो ॥
गौतम करे गूनगान वो मईया... तरसे नज़रिया वो