ऐसे गरज़ रहे हनुमान
ऐसे, गरज़ रहे हनुमान,
कि थर थर, काँप रही लंका ॥
कि थर थर, काँप रही लंका,
कि थर थर, काँप रही लंका ॥
ऐसे, गरज़ रहे हनुमान, कि थर थर...
कहे मन्दोदरी, सुनो पिया जी, मेरे मन शंका ॥
उनकी, जानकी, वापस दे दो ।
अमर, रहे लंका,
ऐसे, गरज़ रहे हनुमान, कि थर थर...
एक लख पूत, सवा लख नाती, काहे की चिन्ता ॥
मेघ, नाथ से, पुत्र हमारे ।
कुम्भ, कर्ण भईया,
ऐसे, गरज़ रहे हनुमान, कि थर थर...
पवन देव मेरी, भरे हाज़री, इन्द्र करे सेवा ॥
अग्नि, देव मेरी, तपे रसोई ।
ब्रह्मा, देव सेवा,
ऐसे, गरज़ रहे हनुमान, कि थर थर...
एक वानर, लंका में आया, उज़ड़ गई बगिया ॥
पेड़, उखाड़े, पहरी मारे ।
फूंक, दई लंका,
ऐसे, गरज़ रहे हनुमान, कि थर थर...
अपलोडर- अनिलरामूर्तिभोपाल