बन्दे चल सोच समझ के क्यों ये जनम गँवाय

चार दिनों की प्रीत जगत में, चार दिनों के नाते हैं।
पलकों के पर्दे गिरते ही, सब नाते मिट जाते हैं।।

बन्दे चल सोच समझ के, क्यों ये जनम गँवाय।
बार-बार ये नर तन चोला, तुझे न मिलने पाय॥

बचपन बीता आई जवानी खूब मजे से सोया।
गुजर गई अनमोल घडी तो देख बुढ़ापा रोया।।
जिस यौवन पे नाज तुझे,वो मिटटी मैं मिल जाय।।
बन्दे चल......

झूठ कपट से जोड़ा तूने, अपना माल खजाना।
माया के चक्कर में फंस कर, ना भगवन को जाना।।
मुठ्ठी बांध के आया जग में, हाथ पसारे जाय।।
बन्दे चल.....

ये दुनिया है सराय मुशाफिर, छोड़ इसे है जाना।
कोई किसी का नहीं जगत में, ये तन है बेगाना।।
उड़ जाये पिंजरे का पंछी, पिंजरा साथ न जाय।।बन्दे चल.......

सारी उमर करता हु रहा तू, ये तेरा ये मेरा।
जान न पाया ओ पगले तू, जग है रैन बसेरा।।
सब कुछ रह जायेगा यहीं, तेरे साथ न कुछ भी जाय।।बन्दे चल.......

अवधेश राणा बृजवासी, मथुरा

श्रेणी
download bhajan lyrics (40 downloads)