प्रभु के दर्शन की उत्कंठा मन में भारी मदारी बनकर शंकर जी चले

प्रभु के दर्शन की उत्कंठा मन में भारी
मदारी बनकर शंकर जी चले...

कर में छड़ी, बजावत डमरू, पगिया सिर पर बांधे।
यंत्र मंत्र टोटक चेटक की झोली लटकी कांधे।
मन के मंदिर में हैं दशरथ अजिर बिहारी,
मदारी बनकर शंकर जी चले ...

एक रूप से बने मदारी, एक रूप से बंदर।
हनुमान और शंकर डोलें अवधपुरी के अंदर।
जुड़ गए दर्शक कितने बालक नर और नारी,
मदारी बनकर शंकर जी चले...

डमरू बाजे, वानर नाचे, दशरथ जी के द्वारे।
राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न दर्शन हेतु पधारे।
लख के उछले दे दे ताली और किलकारी।
मदारी बनकर शंकर जी चले...

माया के कर वानर बनके सारी दुनिया नाचे।
जो रघुवर के सन्मुख नाचे वो माया से बांचे।
राचे रामचरण में सांचे बनके पुजारी।
मदारी बनकर शंकर जी चले।

भक्त और भगवान परस्पर दर्शन से हर्षाए।
छद्म वेश में नाना कौतुक देखें और दिखाएं।
उर धरि नारायण प्रभु भवन चले त्रिपुरारी।
मदारी बनकर शंकर जी चले॥

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