यु ही दरबार तेरा सजता रहे

यु ही दरबार तेरा सजता रहे और मैं दर्शन को तेरे आता रहु,
यु ही भगतो का मेला भरता रहे और मैं भजनो की गंगा बहाता रहु,

मैं हारा थका इक मुसाफिर जिसे तेरे दरबार में मिलता आराम है,
दूर कर देती तू सारी परेशानियां ऐसी मीठी तुम्हारी मुश्कान है,
तुम हमेशा माँ मुस्कुराती रहो मैं तुम्हे देख कर गम बुलाता रहु,
यु ही दरबार तेरा सजता रहे और मैं दर्शन को तेरे आता रहु

तुम से मिल कर मुझे मैया ऐसा लगा जैसे भटके हुए को ठिकाना मिला,
तेरी ममता की इक बूंद में मेरी माँ मुझे खुशियों का सारा खजाना मिला,
प्यार अपना तुम यही लुटाती रहो और मैं भर भर के झोली जाता रहु,
यु ही दरबार तेरा सजता रहे और मैं दर्शन को तेरे आता रहु

सोनू कहता वो लोग नादान है ढूंढ़ते फिर रहे जो सुख संसार में,
सुख सच्चा है जो जहां में कोई वो बरसता है बस तेरे दरबार में,
प्रीत की रीत यु तुम निभाती रहो और चौकठ पे सिर को झुकाता रहु,
यु ही दरबार तेरा सजता रहे और मैं दर्शन को तेरे आता रहु

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