तेरा नाम सुनके दाता दर पर फ़कीर आया,
उस नाम के मुताबिक कर दो करम ख़ुदाया।
सुनते हैं जो भी आया, भर भर के झोली पाया,
पर यह फ़कीर मौला झोली न संग लाया।
गर ख़ाली हाथ लौटा तो कान खोल कर सुन,
हो जायेगा जहाँ से तेरे नाम का सफाया।
सामान दे या ना दे मर्जी तेरी है रहवर,
झोली तो दे दे दाता ठोकर बहुत है खाया।
है देर तेरे घर में अन्धेर तो नहीं हैं,
आशिक 'कृपालु' ने यह राज है बताया।
पुस्तक - ब्रज रस माधुरी-1
पृष्ठ संख्या -210
कीर्तन संख्या -303