अपने अपने कर्मों का फल
धुन- रातोंको उठ उठ के जिनके लिए रोते हैं
कुछ, मांगने से नहीं मिलता, बिन मांगे मिलता है ॥
अपने, अपने कर्मों का, फल सबको मिलता है ॥
इक पानी, ऐसा होता है, मंदिर में चढ़ता है ॥
इक पानी, ऐसा होता है, नालों में बहता है ॥
दोनों की, धारा एक है, पर अंतर इतना है ॥
अपने, अपने कर्मों का, फल सबको मिलता है ॥
कुछ, मांगने से नहीं मिलता...
इक फूल, ऐसा होता है, मंदिर में चढ़ता है ॥
इक फूल, ऐसा होता है, अर्थी पे चढ़ता है ॥
दोनों की, बगिया एक है, पर अंतर इतना है ॥
अपने, अपने कर्मों का, फल सबको मिलता है ॥
कुछ, मांगने से नहीं मिलता...
इक भाई, ऐसा होता है, महलों में रहता है ॥
इक भाई, ऐसा होता है, गलियों में रहता है ॥
दोनों की, माता एक है, पर अंतर इतना है ॥
अपने, अपने कर्मों का, फल सबको मिलता है ॥
कुछ, मांगने से नहीं मिलता...
इक बहन, ऐसी होती हैं, महलों में रहती हैं ॥
इक बहन ऐसी होती है, किस्मत को रोती है ॥
दोनों की, जननी एक है, पर अंतर इतना है ॥
अपने, अपने कर्मों का, फल सबको मिलता है ॥
कुछ, मांगने से नहीं मिलता...
अपलोडर- अनिलरामूर्तिभोपाल