तुझे शंकर कहूँ या शंभु या कहूँ मैं डमरू वाला

तुझे शंकर कहूँ या शंभु या कहूँ मैं डमरू वाला..
तेरे रमी विभूति तन पे, काँधे पे विशधर काला...

गंगाधर नाम तुम्हारा, केशों से गंगा बहती,
यो तरण तारिणी गंगे, सारे जग के दुखडे धोती
खुशियों से दामन भरती, जीवन में करे उजाला,
तेरे रमी विभूति तन पे...

तूने मंथन किया समंदर, फिर हुई थी खींचा तानी,
ना देखा सुना ना जग में, तुझसा कोई ओघड़ दानी
तूने सबको अमृत बाँटा, खुद काल घूँट पी डाला
तेरे रमी विभूति तन पे...

दी गंगा भगीरथ को, कटे सगर राज के जाले लंका दे दी रावण को,
हे भांग धतूरे वाले तेरे देख ढंग निराले, तेरे देखे खेल निराले
तेरे रमी विभूति तन पे...

तेरे सीश साज रहे चंदा, संग गौरा जैसी नारी, तू रहता मस्त भाँग में,
करे नंदी की सवारी, देवों में सबसे पहले पूजता, तेरा गणपति लाला,
तेरे रमी विभूति तन पे...

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