टेक - बिजूरी चमके आधा रात, बादर गरजे आधा रात
चढ़ - होके परसन मोर शीतला मईया...2
बरसादिस अमरित के धार,सुनके लईका के गोहार
लगती वो जेठ के जब आइस महीना,
सुखागे धरती दरकगे भुइयां
नदिया नरवा के पानी सिरावन लागे,
छोटे-बड़े डबरी अटागे कुइंयां
चढ़ - दिखत हे अंधियार, जग मा मचगे हाहाकार – 2
होके परसन मोर शीतला मईया...2
बरसादिस अमरित के धार, सुनके लईका केगोहार
कारी वो रात के घुमड़-घुमड़ के,
धरती म बरसे सरग के बरसा
कड़के बिजुरी बड़ पानी बरसे,
बूंद-बूंद तरसइया बर गिरे झिरसा
चढ़ - मेघ बरसे अनसम्हार, मया बनके जलधार - 2
होके परसन मोर शीतला मईया...
बरसादिस अमरित के धार, सुनके लईका के गोहार
जग हा जुड़ाए शीतलाए भुईयां,
नीर ले नहाये मोर धरती मईयां
चारों मुड़ा हरियर दिखे रुख राई,
हरसे गौतम मन नाचे ता थईया
चढ़ - दाई वो तोर दुलार, पावत हे संसार - 2
होके परसन मोर शीतला मईया..
बरसादिस अमरित के धार, सुनके लईका के गोहार