गोविंद हरे गोपाल हरे जय जय प्रभु दीन दयाल हरे

गोविंद हरे गोपाल हरे

गोविंद हरे, गोपाल हरे,
जय जय, प्रभु दीन, दयाल हरे ॥

तुम, तीन लोक के, स्वामी हो ।
प्रभु, घट घट, अन्तर्यामी हो ॥
है जग में, तुमसे, कौन परे,
गोविंद हरे, गोपाल हरे ।
गोविंद हरे, गोपाल हरे...

माया, में फंसे, हरि भूल गए ।
झूठी, दुनियाँ पे, फूल गए ॥
उस, के कारण, भव कूप गिरे,
गोविंद हरे, गोपाल हरे ।
गोविंद हरे, गोपाल हरे...

मेरे, मन मंदिर में, आ जाओ ।
प्रभु, जगमग ज्योत, जला जाओ ॥
भक्तों, के तुमने, कष्ट हरे,
गोविंद हरे, गोपाल हरे ।
गोविंद हरे, गोपाल हरे...

जन्मो, के बिछड़े, मिल जाओ ।
मेरा, जीवन मरण, मिटा जाओ ॥
हम, आन पड़े, तेरे द्वार खड़े,
गोविंद हरे, गोपाल हरे ।
गोविंद हरे, गोपाल हरे...

माया ने, सब कुछ, भुला दिया ।
तेरा, नाम कभी ना, याद किया ॥
मैंने, जनम मेरा, वर्बाद किया,
बैठा रहा, हाथ पे, हाथ धरे ।
गोविंद हरे, गोपाल हरे...

नईया है, भंवर में, आन पड़ी ।
रोती हूँ, प्रभु जी, खड़ी खड़ी ॥
हम, द्वार तुम्हारे, आन पड़े,
अब, तुम बिन संकट, कौन हरे ।
गोविंद हरे, गोपाल हरे...
अपलोडर- अनिलरामूर्तिभोपाल

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