माँ के जैसा जमाने में दानी नही

माँ के जैसा जमाने में दानी नही
हकीकत यही है कहानी नही,
कोई घर बता जिसकी माँ ही नही
अपने अंचल में माँ जिसको पा ली नही
माँ के जैसा जमाने में दानी नही

माँ की होती है बचो पे ममता अपार,
अमृत बन के बेहती है आँचल से धार
अपनी नजरो से माँ दूर करती नही
देखते देखते आँख थकती नही

आला चरणों में माँ के चडाया था सिर,
उसे जिन्दा किया और कर दिया अमर,
ध्यानु दर्शा  बिना घर को लौटा नही
कोई मायूस महियर में होता नही

माँ के हम पे बहुत सारे एहसान है
ये क्या कम है के हम इक इंसान है
क्यों रधुवीर फिर तू समजता नही
सारी दुनिया में माँ जैसा कोई नही

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