अदालत तुम्हें अब, लगानी पड़ेगी

अदालत तुम्हें अब, लगानी पड़ेगी
ज़मानत मेरी भी, करानी पड़ेगी

खड़ा कटघरे में हूँ, मुजरिम के जैसे
मिलेगी रिहाई, बता मुझको कैसे
जो इंसाफ की तुम, कलम थामे बैठे
उसे हक में मेरे, चलानी पड़ेगी।
ज़मानत मेरी भी, करानी पड़ेगी...

सज़ा काट ली है, बहुत इस जनम में
लिखा क्या है बोलोना, मेरे करम में
बँधी बेड़ियाँ जो ये, माया की मुझपे
इन्हें काट कर अब, हटानी पड़ेगी।
ज़मानत मेरी भी, करानी पड़ेगी...

गुनाहों की गिनती, अगर तुम करोगे
तो फिर कैसे दामन, दया से भरोगे
जो करुणा का सागर, है दिल में तुम्हारे
लहर दीनू पे अब, बहानी पड़ेगी
ज़मानत मेरी भी, करानी पड़ेगी...