सुने री मैंनें रसिकन के हरि प्राण

सुने री मैंनें रसिकन के हरि प्राण

सुने री मैंने ! रसिकन के हरि प्राण।
संकीर्तन सम्राट रसीलो, भगत जगत की शान ।।

कोकिल कण्ठ, मधुर स्वर लहरी, बरसे सुधारस धारा।
मधुर गान की तान अलौकिक, जादू भरा इकतारा ।।
सुन सुन धुन संगीत की सरगम, नाच उठें भगवान-सुने.

जा जा चरण धरे गुरुदेवा, नाम की गंग बहाई।
कृष्ण नामरस पान करन को, उमड़ पड़ी हरिजाई ।।
लाखों तार दीये बिन स्वार्थ, दे भगती दा दान-सुने.

या मीरा या ब्रज गोपिका, या प्यारो बृजचंदा।
या नामा गौरंग कबीरा, या हरिदास मुकुन्दा।।
या कोई युग-पुरुष अवतारी, आयो करन कल्याण-सुने.

खूब पीया पिलाया तूने, भर भर कर पैमाना।
सजी रहे तेरी साकिया महिफल, रहे आबाद महिखाना ।।
आ गई रास 'मधुप' को तेरी, मन मोहिनी मुस्कान-सुने.