तर्ज : सजने का शौकीन
मझधार में छोड़ चले
क्यूं अपने दीवाने को
हमने क्या जन्म लिया
बस आंसु बहाने को ॥
इंतजार की हद तो श्याम
कुछ तो होती होगी
मेरे हाल को पढ करके
कुछ तो सोची होगी
आंधी का होता साथ ज्यूं दीये को बुलाने को॥
गम के पिंजरे का मैं
परकटा परिंदा है
सब कुछ सह करके
तेरी आश में जिन्दा हू।
देते हो औरो को क्या मुझको दिखाने को ॥
नजरो का बिछा के जाल
क्या दिन ये दिखाना था
आगे क्या कम थे दर्द
जो और बढ़ाना था
अब वक्त नहीं गुट्टू नजरों के फिराने को ॥