तर्ज : ओ साथी रे, तेरे बिना भी क्या जीना
ओ सावरे रे, तेरे बिना भी क्या जीना
फूलों में कलियों में, खाटू की गलियों में
तेरे बिना कुछ कहीं न
तेरे बिना भी क्या जीना -२
हर कीर्तन में आस है तेरी, भजनों में तेरी खुशबू है
इस कीर्तन से उस कीर्तन तक, सबकी नज़र में तू ही तू है
तार ये टूटे न ...
तार ये टूटे न, तू मुझसे रूठे न, साथ ये छूटे कभी न
तेरे बिना भी क्या जीना
ओ सावरे रे ...
जाने कैसे अनजाने ही, आन बसा तू मेरे मन में
अपना तन मन खो बैठे हम, दीवानेपन के आलम में
हम तेरे दीवाने...
हम तेरे दीवाने, बस ये तो तू जाने, और ये जाने कोई ना
तेरे बिना भी क्या जीना
ओ सावरे रे...
तुझ बिन मेरी ना जिंदगानी, तुझ बिन मेरी अधूरी कहानी
सिंहल के जी ने का सहारा, यह तो सारी दुनिया जानी
तेरे बिना मेरी
तेरे बिना मेरी मेरे बिना तेरी यह जिंदगी जिंदगी ना
तेरे बिना भी क्या जीना
ओ सावरे रे...
लेखक : सुमित सिंहल (पिलखुवा)