श्राद्ध कर्म (पुनः गंगा मेरी मां का नाम)
श्रद्धा अरु विश्वास से कीजै, श्राद्ध कर्म यह प्यारे।
पितृ-पक्ष में, पितृ-लोक से, आते पितृ हमारे।।
अपना घर परिवार देखने, पितृ धरा पर आते।
सुख्ख-स्मृद्धि देख हमारी, बड़ा ही आनंद पाते ।।
बरस में बस एक बार ही आते पितु हमारे श्रद्धा,
पितृ पक्ष में जो नई वस्तु, चाहो पर ले आवो।
तृप्त कर पितरों को, उनसे शुभ आशीष तुम पायो ।।
पितरों की सेवा-पूजा से, मिट जाते दुःख सारे-श्रद्धा,
शुभ-अशुभ की चिंता छोड़ो, छोड़ो अन्ध विश्वास।
पितृ ऋण से मुक्त होने का, समय'मधुप' यह श्रास ।।
पितृ-पया को शुभ बतलाते, संत ग्रंथ यह सारे श्रद्धा,