आजु होरी है होरी है आजु होरी है

आजु होरी है होरी है आजु होरी है।
रंग बिरंग रंग पिचकारिन, अंग अंग रँग बोरी है।
जोइ देखत सोइ हँसत कहत अस, इन्द्र धनुष छवि चोरी है।
इकटक लखतहुँ जानि सकत नहिं, को छोरा को छोरी है।
सबै दिवाने मनमाने जनु, पिये भंग रस घोरी है।
हमहुँ 'कृपालु' उच्च स्वर सों कह, सखन सखिन सँग होरी है।

रचना : जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
ग्रन्थ : ब्रज रस माधुरी - 1


जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज जी ने अनेक रसमय काव्य ग्रंथों की रचना की है |
प्रेम रस मदिरा, ब्रजरस माधुरी, राधा गोविन्द गीत, श्यामा-श्याम गीत, युगल रस, युगल माधुरी, युगल शतक, भक्ति शतक, श्री राधा त्रयोदशी, श्री कृष्ण द्वादशी
यह सभी ग्रन्थ www.jkpliterature.org.in पर उपलब्ध हैं ।
राधे राधे।

श्रेणी